Saturday, July 23, 2016

सुनो ज़िन्दगी !!

सुनो ज़िन्दगी !!
तेरी आवाज़ तो ......
यूँ ही, कम पड़ती थी कानों में 
अब तेरे साए" भी दूर हो गए 
इनकी तलाश में 
बैठी हुई
एक बेनूर से
सपनों की किरचे
संभाले हुए ......
हूँ ,इस इंतजार में
अभी कोई पुकरेगा मुझे
और ले चलेगा
कायनात के पास .......
जहाँ गया है सूरज
समुंदर की लहरों पर हो कर सवार
"क्षितिज" से मिलने
और वहीँ शायद खिले हो
लफ्ज़, कुछ मेहरबानी के
जो गुदगुदा के दिल की धडकनों को
पूछेंगे मुझसे
कैसी हो बोलो ?
क्या पहले ही जैसी हो ?
‪#‎रंजूभाटिया‬

Thursday, March 10, 2016

एक सवाल

दे कर मेरी ज़िंदगी को कुछ लम्हे खुशी के 
ना जाने वो शख्स  फिर  कहाँ चला  गया 

जो भी मिला मुझे  मोहब्बत के सफ़र में 
वो ही मुझे तन्हा और उदास कर गया 

मांगी थी कुछ रौशनी अपने अंधेरों के लिए 
जो गया और स्याह रंग से इसको भर गया 


यूं ही खेला एक नया खेल मेरे मासूम दिल से 
प्यार के झूठे बोलों से जीने की आस कर गया

खामोश रह कर हम सुनते रहे उनके सारे शिकवे 
 पल में वो मेरी ज़िंदगी को एक सवाल कर गया 

तलाशा था शायद हमने  पानी को सहरा में 
मेरी अनबुझी प्यास में और तृष्णा  भर गया 

Friday, December 18, 2015

आस का दीप

आस का दीप 

दिन चाहे ढल गया है
पर विश्वास बाक़ी है
आस का दीप मत बुझा
अभी कुछ उम्मीद बाक़ी है

दुख की छाया जो कभी पड़े
तो वो जीवन का अंत नहीं
दिल में रहे जज़्बात बाक़ी
तो ज़िंदगी की धड़कन बाक़ी है
आस का दीप मत बुझा
अभी कुछ उम्मीद बाक़ी है

होंठ चुप हैं नयन चुप हैं
स्वर चाहे तेरा उदास है
हवा में बह रहा राग-रंग
भी कुछ सहमा-सा आज है
पर फ़िज़ा में फैली झंकार बाक़ी है
दिल को बाँध सके अभी वो राग बाक़ी है
आस का दीप मत बुझा
अभी कुछ उम्मीद बाक़ी है

बिखरे हो जीवन के रंग सारे
छाए हों राहों पर आँधियारे
पतझड़-सा चाहे यह जीवन लगे
पर अभी कुछ मधुमास बाक़ी है
उम्मीद का दामन मत छुड़ा
कि अभी आस बाक़ी है !! 

Thursday, November 26, 2015

कांच के शामियाने Book Review

" उन सभी के नाम ,जिनकी बातें अनसुनी ,अनदेखी और अनकही  रह गयी "कांच  के शामियाने " का पहला पन्ना और पढ़ने के बाद  लगा कि किसी  के लफ़्ज़ों ने तो उन दिलों की बात कह ही दी जो शायद कभी कह ही न सके ,मैं ,वो या कोई  भी अन्य स्त्री ,आज जिस समाज में हम रहते हैं और जहाँ स्त्री स्वंत्रता का  दावा किया जाता है ,वहां बहुत बदलाव होते हुए भी ,इस लिखे उपन्यास सा सच मौजूद है , आज औरत घर ,बाहर सब तरफ  की जिम्मेदारी बखूबी संभाल रही है ,पर हमारे समाज में पुरुष मन से उस बात को नहीं निकाल पा रही है कि वही सर्वेसर्वा है हर बात का चाहे औरत कितनी भी काबिल क्यों न  हो। ...

"कांच  के शामियाने" उपन्यास एक डायरी के पन्नो सा है जिसमे वक़्त  की चाल पर  जया का चरित्र आज भी शहर ,कस्बे ,गांव में बसी औरतों  के दर्द को ब्यान करता है ,जो समाज को प्रगतिशील होने का दावा करते हुए आईना दिखाती हैं ,पिता की लाड़ली बेटी माँ से अधिक समाज के लिए चिंता का विषय बन जाती है और फिर माँ बुढ़ापे और जिम्मेवारी की दुहाई दे कर बेटी की न नुकर  नहीं सुनती और शादी के लिए जोर देती रहती है ,अब यदि आज के वक़्त जिस में शहर के हालात या लड़कियों की शिक्षा के संदर्भ में देखा जाए तो यह सम्भव नहीं लगेगा जोर जबरदस्ती वाला मामला पर यह भी सच है कि उचित लड़का मिलते ही लड़की ब्याहने और जैसा भी है वही बसने को कहा जाता है अधिकतर ,हाँ कुछ केसेस अपवाद हो सकते हैं।  जया भी पढ़ लिख कर माँ की सेवा करना चाहती है ,शादी की सोच उसके मन  में नहीं पर पड़ोस के राजीव की माँ  जब अपने बेटे के लिए उसका रिश्ता ले के आती है तो जया की माँ को जैसे घर बैठे चिंता से मुक्ति मिलती लगती है ,भाई बहन के लिए अफसर लड़का हर तरह से योग्य नजर आता है और जया की आवाज़ इन सब में खो जाती है ,लड़के वालों की  दहेज़ की मांगे भी तब जया के घर वालों की आँखों के आगे पर्दा डाल देती हैं ,और कोई माने या माने आज प्रगति का दावा होते हुए भी यही सच्चाई है। लड़की की आवाज़ आज भी क्यों दबा दी जाती है ?शादी उसकी है ,जीवन उसका है पर समाज परिवार उसका फैसला करते हैं ,क्यों ?शादी के बाद इतनी प्रताड़ना ,इतनी कठोरता ,क्रूरता ,सब जानते हुए भी लड़की को वहीँ रहने के लिए मजबूर करना पढ़ते हुए एक क्रोध भर देता है। राजीव जैसा बुना हुआ चरित्र जो कहीं अपने ही किसी कपम्प्लेक्स का शिकार है ,आज भी हमें आस पास ही दिखता है। "बेटी तो धरती होती है और धरती की तरह सब सहती है "माँ के जया को समझाते कथन दिल में बेबसी  से    अधिक झंझोर देते है ,पढ़ते हुए दिल करता है कि उस माँ को कहूँ की बेटी की पीड़ा  को समझो उसको सहने की उस हद तक न ले जाओ कि वह खुद के अस्तित्व को ही मिटा दे ,इसी हालात  से गुजरते हुए तीन बच्चे उसके जीवन में एक उम्मीद की किरण लाते हैं ,और वही उसको उस नरक और मानसिक बीमार पति से छुटकारा दिलवाने का साहस बनते हैं।  
उपन्यास जब शुरू किया बहुत जगह  पढ़ते हुए गुस्सा भी आया कि आखिर इतनी बेबसी क्यों बुनी रश्मि ने अपने लफ़्ज़ों में ,पर कुछ सत्य हर किसी की ज़िन्दगी के कहीं  न कहीं करीब होते हैं ,सो  खत्म  किये बिना आप इसको रख नहीं सकते ,यही "रश्मि रविजा "द्वारा लिखे इस उपन्यास की उपलब्धि है। पूरे उपन्यास में हर चरित्र के साथ साथ वहां लिखे गए माहौल को भी मैंने शब्दों के साथ साथ महसूस किया , रहन सहन ,खाना पीना ,जया का रोना ,सहन करना ,रूद्र जया के पहले बच्चे की ख़ुशी और राजीव की असहनीय गाली ,मार ने अपने साथ साथ चलाये रखा ,कहीं कहीं किसी पुराने उपन्यास जैसे पढ़ने का भी एहसास हुआ।
 रश्मि रविजा के शब्दों के जादू से ब्लॉग की दुनिया से परिचित हूँ ,इसी जादू ने अपनी मोहकता यहाँ भी बनाये रखी ,बस कुछ जगह लगा कि कुछ चरित्र जैसे माँ ,सास एक औरत होते हुए भी उस दर्द को क्यों नहीं महसूस करवाये रश्मि ने ,चाहे आखिर में जया की माँ ने उसका साथ पूरा निभाया ,पर लगता है कि माहौल को बदलने के लिए अब इस तरह के चरित्र गढ़ने होंगे ,जहाँ सहन करना सम्भव नहीं वहां परिवार उस मुकाम पर आ के साथ न दे जब सहनशीलता खत्म होने के कगार पर हो ,वही से साथ दे जहाँ से शुरू में लगे कि यह अन्याय है ,राजीव जैसे चरित्र  के लोग असहनीय है और इसको नहीं सहना है। यह उपन्यास था जहाँ अंत सुखान्त हुआ पर असल में हर बार यही हकीकत नहीं होती।कहीं कहीं बार बार शब्दों का दुहराव भी है जो थोड़ा सा बोझिल लगता है। पर फिर अपनी रफ़्तार पकड़ लेता है।  
"कांच  के शामियाने " में इस शामियाने शब्द का अर्थ सार्थक हुआ घर तो कभी बना ही नहीं ,एक शामियाना  ही बन सका बस जो बना और बिखर गया ,रोचक उपन्यास है आपने अब तक नहीं पढ़ा तो जरूर पढ़े। रश्मि को मेरी तरफ से इस सफल उपन्यास की बहुत बहुत बधाई। अगले का इंतज़ार शुरू :)

Monday, November 02, 2015

ज़िंदगी की रात

खोई खोई उदास सी है
मेरी ज़िंदगी की रात
दर्द की चादर ओढ़  कर
याद करती हूँ तेरी हर बात
तुम बिन
ना जीती हूँ ना मरती हूँ मैं
होंठो पर रहती है
हर पल तुमसे मिलने की फ़रियाद
बहुत उदास सी है मेरी ज़िंदगी की रात

रूठ गए  मेरे अपने
टूट गये सब मेरे सपने
तुम्ही से तो थी मेरी ज़िंदगी में बहार
तुम थे तो था मुझे अपनी ज़िंदगी से प्यार
सजते थे तुम्ही से मेरे सोलह सिंगार
अब तो याद आती है बस तेरी हर बात
बहुत उदास सी है मेरी ज़िंदगी की रात

अब तो अपनी छाया से भी डरती हूँ मैं
तुम्ही बताओ अपने तन्हइयो से कैसे लड़ूं मैं
ले गये तुम साथ अपने मेरी हर बात
बहुत उदास तन्हा सी है मेरी ज़िंदगी की रात