Monday, April 20, 2009

भला सिपाहिया डोगरिया

6 दिसम्बर की शाम रेडियो पर ख़बर सुनाई जा रही थी कि कट्टर पंथियों ने बाबरी मस्जिद तोड़ दी सारे देश में दंगा फैल गया है, हज़ारों लोग मारे गये हैं, राष्ट्रीय शोक की घोषणा कर दी गयी है। सब तरफ़ दुख ओर दर्द की लहर है, सारा माहौल सहमा हुआ सुनसान हो जाता है और एक चुप सी छा जाती है



दूर बार्डर पर लड़ते सैनिक सिपाहियों के शिविर में भी जहाँ हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सब कंधे से कंधा मिला कर देश की रक्षा के लिए मोर्चा संभाले खड़े हैं, यहाँ कोई बाबरी, अयोध्या का झगड़ा नही, सिर्फ़ अपने देश के लिए मर मिटने को तैयार हैं। बस..सोच में डूबे हैं वो सब भी कि हम सब क्यों और किसके लिए लड़ रहे हैं? आख़िर यहाँ हमने अपने जान को दाँव पर लगा रखा है, वहाँ हमारे परिवार वाले भी एक लड़ाई लड़ रहे हैं। यहाँ सर्दी गर्मी, बरसात, धूप की प्रवाह किए बिना यह युद्ध सबको दिख तो रहा है.. पर देश के अंदर यह कौन सा अघोषित युद्ध लड़ा जा रहा है ,जिसका कोई नियम नही है।

राजेश भी उन्ही सिपाहियों में देश की रक्षा के लिए वहाँ बार्डर पर तैनात देश का सिपाही था। वो जिस बार्डर पर था ,वहाँ बर्फ़ और ठंड से साँस लेना तक मुश्किल था। उसने जब से यह बाबरी अयोध्या की खबर सुन थी उसका दिल कांप रहा था ....उसका घर संसार भी उसी जगह था .....जहाँ से यह सब ख़बरे आ रही थी। वो बहुत देर से अपनी पत्नी और बच्चे से बात करना चाहता था पर फोन लग नही रहा था और कई दिन से कोई ख़त भी नही आया था। दूर बर्फ़ीली पहाड़ी पर बनी यह पोस्ट बहुत सुनसान थी, सिर्फ़ कभी -कभी अचानक होने वाली गोलो की आवाज़ बता देती थी कि यहाँ भी कोई जीवन है ,चाहे वो सिर्फ़ नाम का है। शुरू शुरू में यहाँ की प्राकतिक सुन्दरता दिल को लुभाती है पर फिर वो सुनसान जगह इंसान को पागल करने लगती है ॥
राजेश अपने बेस कैंप के बाहर अपनी ड्यूटी पर था पर आज उसका ध्यान बार बार अपने घर की तरफ़ जा रहा था ... कानो में डोगरी गाने के बोल गूँज रहे थे.... "भला सिपाहिया डोगरिया दुइ दिन छुट्टी आ जा की तेरे बिना बडा मंदा लगदा ..."।इसका अर्थ उस को उसकी पत्नी का संदेश देता लग रहा था कि दो दिन की छुट्टी ले कर मुझसे मिलने आ जाओ ,तुम बिन बहुत उदास सा लगता है सब, पर दिल में उसकी तस्वीर और कोई संदेश आने के इंतज़ार के सिवा वो कर भी क्या सकता था। भावी मिलन की आस लिए वो अपने परिचय पत्र के साथ रखी अपनी पत्नी, बच्चे की फोटो को देख लेता और सोच में डूब जाता।
तभी उसके साथी ने आ कर कहा कि उसके लिए फोन है, लाइन बहुत जल्दी कट हो रही है, इसलिए जल्दी से आ कर सुन ले। वो भागा उसका दिल किसी अनहोनी आशंका से डरा हुआ था और फोन पर जो उसने सुना वो उसके होश उड़ा देने के लिए काफी था ।वो यहाँ देश की अपनी मातरभूमि के लिए सब कुछ भूला कर अपनी ड्यूटी कर रहा था और उधर देश के अंदर उसका सब कुछ एक जनून की भेंट चढ़ चुका था ....उसकी बीबी की इज़्ज़त, जान और उसके बेटे की साँसे यह अंधे धर्म का जनून ले गया था.. आँखो में आँसू के साथ धुंधली होती बीबी की तस्वीर.. मन को मोहती बच्चे की मुस्कान और कानो में गूँजता गीत.. भला सिपाहिया डोगरीया दो दिन छुट्टी आ जा की तेरे बिना मंदा लगदा ...उसको जैसे दूर कही गहरी वादी से आता लग रही था। दिल में एक सन्नाटा सा छा गया था.. गोलियों की रह रह कर आती आवाज़ अभी भी यह बता रही थी कि जीवन अभी बाकी है और यह यूँ ही चलता रहेगा....


यह मेरी कहानी विधा की कोशिश में पहली लघु कहानी थी जो बहुत पहले पब्लिश हो चुकी है .. । जो कुछ भी हमारे आस-पास घटता है वो कहीं दिमाग़ के किसी कोने में संचित होता रहता है। नया ना लगे शायद आपको मेरी इस कहानी में। इस में कई परिवेश आपको शायद जाने पहचाने लगे क्यूँकि मेरी अधिकतर कहानियाँ आस-पास के माहौल से हैं जो रोज़ाना हम देखते हैं, सुनते हैं, वही चरित्र - कहानी के रूप में आपके सामने है ..इस कहानी का शीर्षक "भला सिपाहिया डोगरिया "एक बहुत मशहूर डोगरी गाने की पंक्तियाँ हैं ... काफ़ी वक्त जम्मू आर्मी माहोल में गुजारा है ,यह पंक्तियाँ आज भी दिल दिमाग में गूंजती रहती है ..
रंजना [रंजू ]भाटिया
२० अगस्त २००७

38 comments:

दिगम्बर नासवा said...

बहुत ही मार्मिक, भाव पूर्ण कहानी है दिल को छूते हुवे...............कुछ ही शब्दों में इतनी गहरी बात लिखी है. आपकी कहानी में वास्तविकता का मिश्रण है बरबस दिल भर आता है

Udan Tashtari said...

लगता ही नहीं कि यह प्रथम प्रयास है. एकदम सधा हुआ अंतिम पंक्ति तक. लघुकथा के सारे मानक पूरी करती अभिव्यक्ति!!

बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाऐं. और लिखो!

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) said...

बहुत ही मार्मिक कहानी.. आंखें नम हो आईं..

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) said...

बहुत ही मार्मिक कहानी.. आंखें नम हो आईं..

अल्पना वर्मा said...

बेहद मार्मिक कहानी है रंजना जी.
कहा भी गया है न ..साहित्य समाज का दर्पण होता है.
आप का यह प्रथम प्रयास सराहनीय रहा.उस के बाद लिखी कहानिया भी पढ़वायीएगा

संगीता पुरी said...

बहुत मार्मिक लघु कहानी ... अन्‍य कहानियों को पढने की भी इच्‍छा हो रही है।

मोहन वशिष्‍ठ said...

दिल को छू गई रचना जी आपकी यह पहली रचना

Arvind Mishra said...

बढियां कहानी !

MANVINDER BHIMBER said...

बहुत ही मार्मिक कहानी.. आंखें नम हो आईं

mehek said...

bahut hi marmsparshi katha,jaise saare kirdar aur vakiye ankhon ke samne ho,dua hai aisa kisi ke saath na ho.

अनिल कान्त : said...

mujhe bahut achchhi lagi yah ....bahut achchha likha hai aapne

अभिषेक ओझा said...

बहुत बढ़िया कहानी. बिलकुल फ्लो लिए हुए.

अशोक पाण्डेय said...

रंजना जी, आपने बहुत ही अच्‍छी व मार्मिक कहानी लिखी है। जो लेखनी इतनी सुंदर कविताएं लिखती है, उसकी कहानियां भी सुंदर ही होंगी।

डॉ .अनुराग said...

हमें तो ये कहानी नहीं लगी .ऐसी कई हकीक़ते लोग झेल रहे है ....देश के भीतर के दुश्मन देश के लिए ज्यादा खतरे वाले है ,

अफ़सोस की बारामूला ,श्रीनगर ,पूंछ में शहीद हुए किसी सेना के जवान पर कोई प्रोफेशनल कवि कविता नहीं लिखता......

PN Subramanian said...

बड़ी दर्दनाक.

ताऊ रामपुरिया said...

अति मार्मिक कहानी. शुभकामनाएं.

रामराम.

Tapashwani Anand said...

shayad yah wahi ghatana hai jiske bad hamne ghar foonkane wale insan ko lauh poorush ka darja de diya aur wo apne aapko aisa kahe jane par bada garv bhi mahsoos karta hai

dhany hai ye bharta bhumi.........

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

बहुत ही सेकुलर कहानी है . क्योकि बाबरी मस्जिद का जिक्र ही हिन्दुस्तान मे सेकुलर की पहचान है . अन्यथा न ले अनायास ही विचार आ गया .

डॉ. मनोज मिश्र said...

बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं - इस कहानी के लिए .

Syed Akbar said...

बहुत ही मार्मिक कहानी...... और सिर्फ़ कहानी नही.... हक़ीक़त.....

रश्मि प्रभा said...

दिल को छूती कहानी.....

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बहुत मार्मिक कहानी है। पर क्या मोटी खाल के कछुओं पर भी असर करेगी?

सुशील कुमार छौक्कर said...

मर्म को छू गई आपकी ये दर्दनाक कहानी। पता नही वो दिन कब आऐगा जब एक इंसान .......

आदर्श राठौर said...

वर्षा कटोच का गाया हुआ ये गाना बचपन में सुना करता था...
आपने बहुत भावपूर्ण लिखा है

मुनीश ( munish ) said...

very moving tale indeed! this song ''bhala sipahiya..'' is available in Lata ji's voice.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

भावपूर्ण लघु-कथा के लिए शुभकामनाएँ।

मोना परसाई "प्रदक्षिणा" said...

यह कहानीहर उस व्यक्ति को जो अपने कामके प्रति ईमानदारहै ,कहींगहरे तक कचोटती है

आलोक सिंह said...

बहुत मार्मिक कहानी , दिल को छू लेने वाली है !!

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

एक सार्थक एवं प्रेरक लघुकथा है। हार्दिक बधाई।

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खुशियों का विज्ञान-3
ऊँट का क्‍लोन

vandana said...

kahani to kahin lagi hi nhi . aisa laga jaise sab same ghatit hua ho.
vaise sach bhi to yahi hai aur bahut se logon ke sath aisa hua hai.
bahut hi hridaysparshi.

गौतम राजरिशी said...

जाने मितने "बड़ेखानों" में इस गीत को गाया है और इस की धुन पर नाचा हूँ...

आपका इ-मेल चाहिये

Nitish Raj said...

कोई माफ नहीं करने जा रहा इन नेताओं को उस विध्वंस के लिए। अच्छी लगी।

दर्पण साह "दर्शन" said...

wah kya likha hai...
..ankhoon main aansu ki ek boond to avysha aayegi...

poemsnpuja said...

बहुत ही मार्मिक कहानी है...दिल पर गहरा असर करती है

Poonam Agrawal said...

Ek chitran sa khich gaya najron ke samne....atyant marmik ...dil tak pahunchne vali prastuti...

Anonymous said...

आपकी कहानी बहुत ही मार्मिक एवं दिल को छू लेने वाली है। मैं इसे अपने फेसबुक पर डाल रहा हूँ। अगर आपको कोई आपती है तो बताइगा। उसके लिए अग्रिम क्षमा

ranjana bhatia said...

namskaar ji shukriya pliz apna naam to bataaye ?kya aapne mere naam se yah kahani post ki hai yaid haan mujhe koi aetraz nahi par post karte waqt link aur naam jarur de mera aur apna naam bhi bataye

mohinder kumar said...


भावपूर्ण लघू कथा के लिये बधाई स्वीकारेँ