Friday, October 19, 2012

"वो लड़की जो शहर की दीवारों पे लिखती रहती है शहर भर में "

इक सुबह/मेरे आँगन में आ गया/इक बादल का टुकड़ा/छूने पर वो हाथ से फिसल रहा था/मैंने उसे बिछाना चाहा /ओढ़ना चाहा/पर/ जुगत नहींबैठी/फिरबादल को न जाने क्या सूझी/छा गया मुझ पर/मैं अडोल सी रह गई/और समा गई बादल के टुकड़े मे     और मैं मनविंदर का लिखा संग्रह पढ़ कर "अडोल" सी रह गयी ...मनविंदर भिंभर की लिखी यह पंक्तियाँ उनके संग्रह "अडोल" से है ..निरुपमा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह संग्रह बहुत सुन्दर आवरण में  लिपटा हुआ मेरे हाथ में आया तो कितनी बातें जहन में घूम गयीं | उन से हुई पहली बातचीत और भी बहुत कुछ | मनविंदर को मैं कैसे मिली ..या वो मुझे कैसे मिली ...यह जब याद करूँ तो याद आता है कि आज से तीन साल पहले मेरे पास एक मेल आया जो बहुत अपनेपन से बहुत प्यार से मेरी लिखी गयी कविताओं के बारे में था ..मैंने भी हमेशा की तरह  उस को उसका जवाब दे दिया .और .उसके बाद मेल का सिलसिला बढ़ता गया ..फ़ोन पर बात शुरू हुई ...और फिर उन्होंने "साया मेरे पहले संग्रह" के बारे में अपने अखबार में लिखा ,"मेरे ब्लॉग के बारे में" अपने विचार व्यक्त किये ...मेल से ही हम दोनों ने न जाने कितनी बातें शेयर की ,सपने डिस्कस किये ..पर कभी मुलाकात नहीं हो पायी ..फिर थोडा सा बातचीत में अंतराल आ गया ..पर जुड़े रहे एक दूजे से और यह इतना सहज था की मैं कभी उन्हें "मनविंदर जी" कह ही नहीं पायी ...उनके इस पहले संग्रह" अडोल" पर मैं उतनी ही खुश हूँ .जितनी वो मेरा पहला संग्रह "साया" पढ़ कर खुश हुई थी ...एक कड़ी और जो सामान है हम दोनों में वह है "अमृता प्रीतम" ....दोनों ही हम उसको सामान रूप से पसंद करती है और लिखती है उस पर ....

अडोल संग्रह पढ़ कर मुझे अमृता की ही याद आई ..दिल से लिखी यह नज्में बेहद खूबसूरत हैं सबसे बेहतरीन बात जो वाकई मेरे दिल को बहुत गहरे तक छु गयी ...उन्होंने इसका विमोचन अपनी माँ के हाथो करवाया ...सीधी सादी मनविंदर ने बहुत सरलता से इसका संग्रह को जीवन का प्रथम पाठ पढ़ाने वाली माँ के हाथो में सौंप पर यह कहा

 लीजिये ......मेरी "अडोल" के चेहरे से घूँघट  उठा दिया मेरी माँ ने ....  "अडोल" मेरी नज्मों का गुलदस्ता

 "बहुत ही अदभुत क्षण रहा होगा न यह मनविंदर ?"...मैं तो जान कर ही भावुक हो गयी |देश के माने हुए अखबार "हिन्दुस्तान" में" प्रमुख संवाददाता "पद की गरिमा बनाए हुए मनविंदर पेशे से पत्रकार हैं और इस खबर की दुनिया में ज़िन्दगी वाकई उनको रोज़ छु कर निकल जाती होगी अपनी घटनाओं से उन्ही की लिखी एक बात भी बहुत बेहतरीन लगी ...."बहुत बार ऐसा हुआ ,जो दिन में देखा ,उसने रात को सोने नहीं दिया |अन्दर से आवाज़ आती ,जी खबर लिख कर आई हो ,वो अधूरी है .सच लिखना अभी बाकी है |खबरों के सफ़र में मुझे ऐसे कई सच मिलते रहे जो खबर नहीं बन सके और वो ही सच नज्म बन गए "........जो इस संग्रह के रूप में हमारे सामने आये ..उनकी लिखी यह नज्म इस सच की गवाह है

 मन में आती है कई बातें ,कई बार
कुछ कहने को जो नहीं होता ,हर बार
एक डर का पहरा होता है कई बार
कोई सर्द सी शिकन दिखती है ,हर बार ..


 एक सच जो खबर में कहीं छिपा हुआ पर लिखने वाले के दिल में आक्रोश पैदा कर देता है ..वह विवशता इन लिखी पंक्तियों में उभर कर आई है |मनविंदर की कवितायें अक्षरों के काफिले के साथ चलती अपनी पहचान छिपाए ख़ामोशी से चलती एक औरत द्वारा अभिव्यक्त के कुछ जिंदा रास्तों की तलाश की कवितायेँ हैं यह कहना है मृणाल पांडे का जिन्होंने इस में प्रकथन लिखा है और साथ ही यह .......की इन कविताओं को तमाम उन लोगों को पढना चाहिए जो सचमुच जानना चाहते हैं की सामजिक मुखोटों के परे ,तमाम वर्जनाओं के बीच जी रही औरत के मन की अँधेरी ,बाहर निकलने की कलपती दुनिया का सच कैसा है ?

 काले घेरों में लिपटी
उसकी बेजान आँखे
पता नहीं
इन आँखों ने कभी
कोई ख्वाब देखा
या नहीं
कोई नहीं जानता
रिश्तों के हाशिये पर खड़ी
वो लड़की
बस चलती रही

............... पढ़ कर बस एक चुप्पी सी लग जाती है
..आँखों के काले घेरे पढने वाले के मन को घेरने लगते हैं ..अजनबी नज्म में की यह पंक्तियाँ कुछ और कह जाती है

कह दो इन पगडंडियों से
फिर से बन जाएँ अजनबी
और फिर हम चलें
इन पगडंडियों पर
अपनी अपनी तन्हाइयों के साथ
अपनी अपनी परछाइयों के साथ .........

 

वाकई यह तलब दिल की कैसे इन लफ़्ज़ों में उतर कर आई है ..की पढ़ते ही दिल से एक आह निकल जाती है ..और एक दूसरी नज्म की पंक्ति गीली हैं तो आँखे -हलचल है तो ख्यालों में ...कितने सवाल कितने जवाब एक अजीब सी रहस्य सी हैं मनविंदर की लिखी यह नज्मे जो कभी सूफी रब्बी मसला भी महसूस करवा देतीं है|
सवाल बहुत है
पर दिल डरता है जवाबों से
कहीं जवाब "यह "न हो
कहीं जवाब "वो "न हो
इसी "ये और वो" में तो
ज़िन्दगी बसर हुए जाती है


      उनकी लिखी इन नज्मों को यूँ ही आप सरसरी तौर पर नहीं पढ़ सकते हैं ..उनको समझना है तो उनकी तह तह जाना होगा डूबना होगा उन लिखे लफ़्ज़ों में ...जो अडोल को एक यादगार संग्रह बना गए हैं उन्होंने इस में जो अपनी बात कही है वह भी बहुत ही बेहतरीन है ...की उनका यह नज्म लेखन गुरु ग्रन्थ साहिब जी की वाक् की तरह है वाकई यह बहुत सुन्दर लफ़्ज़ों से सजा है ..मैं तो डूब कर रह गयी इस में ...
मुद्दत बाद
उम्रें ठहर गयीं
उनकी नजरें मिली
एक दूसरे  को
देखा
जैसे तपती धूप में
ठन्डे पानी के घूंट भर लिए हो ...

और यह सच जो उनके लिखे लफ़्ज़ों का सच ब्यान कर गया जो उन्हें अक्षरों की माला के रूप में कोई जोगी दे गया और वह उस नूर को यूँ लफ़्ज़ों में कह गयी
मंत्रों के नूर से उजली हुई
वो माला मेरे सामने थी
मैं अडोल-सी खड़ी रह गई
और सोचने लगी
कैसे लूँ माला को

यह वही अक्षर हैं जो सोच से से भी आगे हैं कभी कलम को  छुते  हैं कभी कागज पर बैठते हैं और कभी गीत बन जाते हैं ..और अंतर्मन  में उतर जाते हैं असल नज्म की लिखी इन पंक्तियों के माध्यम से ..
तेरे कमरे में
सब कुछ बिखरा है
कहानियों के अधूरे ड्राफ्ट
तकिये पर रखी डायरी
डायरी के पन्नो में रखा पेन
हर दिन पन्नो पर धरे जाने वाले
उदास ,हंसाते बिसूरते ,चिढाते
अक्षर ...........

सही में एक लिखने वाले मन का परिचय जो इसी नज्म में लिखी पंक्ति की सोच को और भी मुखरता से कह जाता है" कि कई बार सोचा समेट दूँ तुम्हारा बिखरापन लेकिन तुम तो बेतरतीब हो कैसे जानोगे असल" .........मुझे तो इनके संग्रह में संजोयी हर नज्म ही बहुत बहुत अपने दिल के करीब लगी ..वह सच जो इन अक्षरों में अपनी बात कहता हुआ दिल में बस गया उनकी लिखी इस सहेलियाँ नज्म सा ..
दो सहेलियाँ
एक ही देह में रहती हैं
साथ साथ
दुःख कुरेद्तीं है

गहरे तक यह उतरे अक्षर अन्दर के तूफ़ान को ब्यान कर जाते हैं जो बहुत कहना भी चाहते हैं और बंधे हुए भी हैं ..
एक लड़की
मैं जानती हूँ उसे
बहुत नजदीक से
बातें करती हूँ उस से
वो चाहती है
तितली के रंग ओढना
पेड़ों की छांव में बैठना
फूलों की खुशबु में जीना
...यह वही एहसास हैं जो मनविंदर के मन के साथ साथ मेरे मन ने भी पढ़ लिए सोयी जागी आँखों से ...और दिल उस शक्ति से फ़रियाद करने लगा ..मुझे बचा लो /रस्मों से /कानूनों से/दावों से /और पहना दो मुझे /अपने रहम की ओढ़नी ....उनके लिखे हो को पढ़ते हुए मेरा दिल तो हर नज्म की पंक्ति यहाँ लिखने का हो उठा है ..हर लिखा हुआ अक्षर एक पुकार है वाकई अंतर्मन की जो चुपचाप बैठ से अपने से ही बात करते हुए पढ़ी जा सकती है
या रब्बा
बादल चीखे या चिल्लाएँ
गरजे या पगलाएं
इधर उधर मंडराएं
पर जब मेरा मौसम आये
मेरे मन की धरती पर
बिन पूछे छा जाएँ

कौन नहीं चाहता यह मौसम ..हर दिल की पुकार छिपी है इन पंक्तियों में ...अपने में सम्पूर्ण यह नज्मे बहुत रहस्यवादी है बहुत गहरी हैं .कोई कमी मुझे इन में दिखी नहीं ..अमृता प्रीतम के साथ जुड़े होने का एक एहसास सा हुआ इनकी लिखी कई नज्मों में ...हर नज्म के बारे में लिखूं तो भी कई बातें अनकही रह जाएँगी ...दिल से लिखे इस संग्रह को अवश्य पढ़े तभी दिल की बात समझ पाएंगे ..फिर भी मैं कुछ और नज्मों का ज़िक्र नहीं करुँगी तो यह समीक्षा कुछ अधूरी सी लगेगी ...अरसे बाद दराज़ खोला /आँखों में वो अक्षर तैर आये जिन पर लकीरें फेरी गयीं थी ...दराज़ नज्म से ..तेरा इश्क बैठा था हर अक्षर की ओट में/डायरी तो हाथ में थी लेकिन /अक्षर बहुत ऊँचे स्थान पर खड़े थे ..डायरी नज्म से ....सूरज को भीतर उतार लूँ /और रौशनी को हो मेरी तलाश /सेक से यह ली गयी पंक्तियाँ रोशन कर देती है पढने वाले को और एक खूबसूरत एहसास में रंग देती है ..मनविंदर की इन नज्मो के कई बिम्ब बहुत ही सुन्दर है नए हैं ..लफ्ज़ पंजाबी रंग लिए हुए हैं जो बहुत ही सहजता से अपनी बात कहते हैं जैसे "बुक्कल "शब्द का बहुत बढ़िया प्रयोग उनकी एक नज्म में लगा मैं तन्हाई और बुक्कल
देर तक तन्हाई /मेरी बुक्कल में बैठी रहती है ..और ख़ास बात की हर रिश्ते की गहराई को पढने वाला इस संग्रह में पढ़ सकता है ..माँ .पिता और बेटी पर लिखी हर पंक्ति अपनी सी लगती है ..सबका ज़िक्र करना यहाँ बहुत मुश्किल है .....
खुद मनविंदर के शब्दों में अडोल "..उन हादसों और मुलाकातों का जिक्र भर है जो मुझे कभी ख़बरों के सफर में मिले और जुदा हो गए लेकिन उनका असर रह गया  मैंने उन्हें नज्म की शकल देने का एक पर्यास भर किया है
"वो लड़की जो शहर की दीवारों पे लिखती रहती है शहर भर में "






8 comments:

sushma 'आहुति' said...

मन में आती है कई बातें ,कई बार
कुछ कहने को जो नहीं होता ,हर बार
एक डर का पहरा होता है कई बार
कोई सर्द सी शिकन दिखती है ,हर बार ..bhaut kuch kahti hai ye panktiya...

Anju (Anu) Chaudhary said...

खूबसूरत एहसास की कृति .....आपको और मनविंदर जी को बहुत बहुत शुभकामनाएँ

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सुंदर पुस्तक परिचय ....

अनामिका की सदायें ...... said...

bahut sundar parichay diya aur kavita shaili ne to bas baandh hi liya aur kheench le gay har shabd apni gehrayi tak mujhe khud-b-khud.

काजल कुमार Kajal Kumar said...

मनविंदर बहुत अच्‍छा लि‍खती हैं

प्रवीण पाण्डेय said...

आज अडोल अपनी जीवन्तता से डोल गया।

Dheerendra singh Bhadauriya said...

मनविंदर जी द्वारा लिखा संग्रह "अडोल" की समीक्षा और परिचय के लिये,,,आभार,,,,

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Meenakshi Mishra Tiwari said...

sundar ranju ji...

aapke shabdon ka jawaab nahi

saadar